Thursday, March 3, 2011

प्रथम सोपान्
गुरूरूब्रह्मा गुरूरूविष्णु गुरूरूदेवोमहेश्वररू ।
गुरूरूसक्षात परमब्रह्म तस्मै श्रीगुरूवेरू नमरू ।।
यह किताब रेपर्टरी के प्रेक्टिकल टिप्स पर आधारित है। किसी को भी इसे रेपर्टरी वर्क समझने की भूल से बचना चाहिए ।
यह मेरे प्रेक्टिकल अप्रोच से पूर्ण है, जिनके द्वारा मैं किसी रोगी की similimum Remedy तक पहुँचता हूँ।
इसमें वे महत्वपूर्ण टिप्स है, जिनका मैं इस्तेमाल करता हूँ,किसी रिमेडी के बारे में जानने के लिए और रोगी के बीमारी में सादृश्यता के लिए ।
यह Method, जिसे मैं similimum के लिए इस्तेमाल करता हूँ, वो डा० हैनिमैन के organon से ही लिया है, जिसमें उन्होंने मुझे सिखाये है कि किसी रोगी की चिकित्सा में

१. एक सच्चा होमियोपैथ Cause of Disease को आधार मानता है ;(सूत्र २०५ आर्गेनन)
2.यह रोगी की मानसिक प्रवृति ही है, जो कि होमियोपैथिक दवाओं के चुनाव में मुख्य आधारशिला बनती है ;(सूत्र २११ ओर्गेनन)

दुसरी बात, मेरे रोगियों प्रति, आभार प्रकट करता हूँ, जिन्होंने मेरे उपर श्रधा एवं विश्वास रख कर चिकित्सा करायें,
जिनसे अपार अनुभव प्राप्त कर सका और समझ सका कि ष्सफल होमियोपैथिक चिकित्सा कैसे की जा सकती है।
इसलिए मेरा पहला श्रधा सुमन डा० हैनिमैन रचित आर्गेनन एवं दूसरा श्रधा.पुष्प रोगियो को अर्पित है क्योंकि वे वही रोगी है,
जिन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से मेरी सहायता किये हैं, जिनके कारण, मैं रूबरिक्स ;रिपर्टरी और मेटेरिया मेडिका कांे बेहतर से बेहतर तरीके से समझ सका और मारात्मक रोगों में भी असाधारण सफलता अर्जित कर सका ।
मैं खास तौर से, प्रो० डा० जगदीश नारायण सिंह, डा० पी० के० चौधरी. डा० आर० पी० सिंह, डा० सुनील कुमार, डा० राजन द्विवेदी, डा० कविता, डा० आकांक्षा, डा० ललित पाहवा, डा० हिमानी को धन्यवाद देना चाहूँगा।
इन सभी ने इस पुस्तक के लेखन में भरपुर सहयोग दिया ।
यह मेरा प्रयास है कि मैं उन चीजों को सामने लाँउ, जिन्हे मैं किसी रोगी की चिकित्सा के दौरान मेरा दिमाग में उभर कर आती है। What is my actual thought process when a patient comes and sit in front of me iswhat I am trying to convey through this Book"SEHGAL METHOD OF HOMOEOPATHY"
इस किताब के लेखन में जिन.जिन ग्रन्थों का सहयोग मिला, उनसे मैं आभारित हूँ जिनका नाम ना लिखना कृतध्नत्ता होगी और अंत में, मैं अपने परिवार के सदस्यों के प्रति भी धन्यवाद प्रेषित करता हूँ जिन्होंने इस किताब के लेखन के दौरान आये हुए परेशानियों को मुझ तक पहुँचने नही दिया।

MindHeal Homeopathy


This week, we’re taking a look at Strong Medicine and how allopathy is designed to cause, not cure, disease. We go beyond its clichéd “side-effects” and explore how the disease process cleverly dodges synthetic medicines and burrows deeper and deeper to camouflage itself.
Did you know that regular use of antacids and other synthetic drugs can turn indigestion into arthritis and then cancer at a later stage? No, all that’s gone is not cured!
Click here to discover the mysterious journey of dynamic human energy – in sickness and in health…
www.mindhealhomeoclinic.blogspot.com/2010/11/all-thats-gone-is-not-cured.html
Also, a special takeaway that can help you predict the course of disease with unerring accuracy.
PS: If you like what you read, you may Bookmark this blog or subscribe to the RSS feed to get regular updates. Also, browse through my new News page for the latest global homeopathy news, snippets, information, videos and much, much more!
Re-awaken the healer in you…
- Dr Anita Salunkhe, MD
MindHeal Homeopathy
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Wednesday, March 2, 2011

happy new year ..............Dr.Ashok Gupta,Loyala Homoeopathic Mind Academy,(A non commercial for qalifief homoeopaths)A sister concern of M.T.H,Bett

happy new year ..............Dr.Ashok Gupta,Loyala Homoeopathic Mind Academy,(A non commercial for qalifief homoeopaths)A sister concern of M.T.H,Bettiah

Thursday, February 24, 2011

आप चाहते है कि आपकी चिकित्सा से चमत्कार हो?

वो जो कम से कम दवा लिखते हैं वो BEST HOMOEOPATH है ।
यह एक GOLDEN RULE है ।
कोई जो कि सफल होमियोपैथिक चिकित्सक बनना चाहता है, उन्हें अनावश्यक दवाओं को देने से बचना चाहिए ।
ऐसी जगह पर हमें सोचना चाहिए कि ‘‘कब दवा दें’’ और ‘कब’ ना दें ।
होमियोपैथी में हजारों किताबें मेटेरिया-मेडिका के रूप में हैं, यहाँ तक कि आर्गेनन और फलास्फी, जो हमें दवा PRESCRIBE करने के लिए ‘‘गाईड’’ करते हैं ।
यह नहीं बता पाते कि कब ‘‘दवा’’ देनी चाहिए ।
केश नं0-1
एक रोगी अतिसार से पीड़ित हो मेरे पास आया, और बोला कि डाक्टर साहब, आज तीसरा दिन है मै इसकों भुगत रहा हूँ ।
दो दिन से यही हाल है, रोज लगभग 25-30 पखाने हो रहें है , बिल्कुल पानी की तरह एवं कभी पीले । और कुछ खाँउ, तब तो जरूर जान पड़ता है अगर थोड़ा देर भी हो जाये तो पखाना मेरे रोकने से नही रूकने वाला है।
जब रोगी से पूछा गया कि-तुम परसो ही क्यों नही आ गये ?
तो जवाब मिला कि एक तो ना मुझे कही जाने की शक्ति थी और ना ही पखाना मेरे CONTROL में था कि आपके पास 2 घंटा इंतजार करता । तब आज कैसे आ गये-मेरा अगला प्रश्न था ।
वह बोला-आज मैने ना कुछ खाया और ना कुछ पीया है, इसीलिए पखाना नही लगा है।
दो दिन तक बहुत कमजोरी थी, कल से पखाने की बारम्बारता में कमी भी आई है और आज सुबह से कुछ खाने की ईच्छा भी बनी है एवं आज सिर्फ 3 ही पखाने हुए है । रात को अच्छी नींद के कारण मुझ में चलने की शक्ति भी आई है, इसी वजह से आज आया हूँ।
नया सवाल मैने रोगी से पूछा कि क्या तुम्हे सचमुच भूख लग रही है या जबरदस्ती तुम खुद कुछ खाना चाहते हो ।
नहीं-नहीं, आज सचमुच में 3 दिन के बाद मैने नास्ता किया है ।
उपरोक्त केस में,
अतिसार निश्चित रूप से कुछ IN FACTION के कारण या TOXIN आ जाने के कारण [खाने के साथ या अन्य तरीके से] ।
अब हुआ यह कि शरीर ने उसको अपने स्तर निष्क्रिय करना चाहा, मगर वह निष्क्रिय नही हुआ, और शरीर उसको सह भी नही पा रहा है, यह चीज अगर शरीर में रहेगा तो शरीर को नुकसान पहुँचा सकता है, तब शरीर अपनी सुरक्षा के मद्देनजर, उस TOXIN को बाहर फेकना शुरू करता है, जो कि हमारे सामने अतिसार के रूप में आया ।
सत्य यह है कि अतिसार जो पैदा हुआ वह शरीर की अपनी सुरक्षा के कारण हुआ, तभी जाकर शरीर स्वंय ही CURE हो सका ।
यह CURE तभी आया जब शरीर से TOXIN बाहर निकल गया और उसकी जगह CURE पहुँच गया तब अपने आप ही रोगी अच्छा लगने लगा, कमजोरी कम हुई, अच्छी नींद आयी, पखाना कम जो गया और उसमें शक्ति का संचार हो गया और उसकी भूख भी वापस हो गयी। सामान्यतः स्वास्थ्य का यही मापदंड है कि काम करने की ईच्छा जगे,
काम करने की शक्ति आ जाये
खाना खाने की स्वतः ईच्छा हो ना कि जबरदस्ती
और इन सभी से ज्यादा महत्वपूर्ण है नींद का आना ।
अगर यह सभी कुछ हो रहा हो तो अब यह कहने कि जरूरत ही नही कि पखाना रूक जायेगा। नही-नही ‘‘पखाना रूक जाना’’ यहाँ सही शब्द नही हे बल्कि यह कहना ठीक होगा कि अब 24 घंटो के अन्दर पखाना सामान्य हो जायेगा । अब इस रोगी को सिपर्फ PL देकर कहना होगा कि जाओ, तुम्हारा पखाना कल से सामान्य हो जायेगा ।
आपकी भविष्यवाणी सच हो सकती है, अगर आप PHYSIOLOGY OF MAN को ठीक से समझते है, तो ।
आपके रोगी के अन्दर भी एक डाक्टर है, उसको भी आपको सम्मान देना होगा। अगर वह रोगी को CURE की पथ पर ले जा रहा है, तो किसी को भी हक नही है, उसमें व्यवधन डालने का , चाहे वह होमियोपैथ हो अथवा एलोपैथ ।
क्योंकि वह जानता है कि शरीर के लिए उत्तम क्या है ?
केस न0-2
एक बच्चे को 4 दिन से बुखार था, जिसे मेरे पास ईलाज के लिए लाया गया । बच्चा सुस्त था, रात को बुरी तरह खांसी आती थी, साथ ही थोड़ा-थोड़ा पानी की प्यास । जब इस बच्चे को होमियोपैथी एवं ऐलोपैथी से ईलाज के पहले लाया जाता तो आप कौन सी दवा देते उसे, लेकिन उसे इसी स्थिति में दवा की जरूरत है?
सबसे पहले यह जानना होगा कि बुखार पिछले 3 दिनों में कभी उतरा था या नही ?
दुसरी बात का पता लगायेगें कि क्या इसके क्रियाशीलता में कोई कमी आयी है या नही ?
तीसरी बात - क्या बच्चा कुछ खाने के लिए माँग कर रहा है या नहीं ?
अगर हाँ तो बच्चा निश्चित रूप से CURE की दिशा में अग्रसर हो गया है ।
अगर बच्चा कल की अपेक्षा आज खेल रहा है और खाने के लिए मांग कर रहा है, तो इसका सापफ मतलब है कि बच्चा अपने-आप स्वस्थ हो रहा है ;अगर अभी बुखार है भी तो अगर इस स्थिति में ऐलोपैथ को बुलाकर VIRAL INFECTION के लिए कोई दवा दी जा रही है तो यह अपराध् है ।
इस स्थिति में कोई भी दवा की जायेगी तो बच्चे को बुखार के साथ नई बीमारी शुरू हो जायेगी और RECOVERY दूर चली जायेगी ।
हमें व्यक्ति के INTERNAL CURATIVE MECHANISM का सम्मान करना चाहिए।
SINGLE REMEDY SINGLE DOSE
अगर आप चाहते है कि आपकी चिकित्सा से चमत्कार हो, अगर इसे स्वंय अपनी आँखो के सामने देखना चाहते है,
अगर आप टायफाइड बुखार को 24 घंटे में खत्म करना चाहते हैं,
अगर निमोनिया को 48-72 घंटो में ठीक करना चाहते हो, [RADIOLOGICALLY],
अगर पेशाव के 100-135 पस-सेल्स को 48 घंटो के भीतर गायब देखना चाहते हो, या
अगर अपनी चिकित्सा से एलोपैथों को आश्चर्यचकित कर देना चाहते हो, तो इसका सिर्फ और सिर्फ एक ही रास्ता है- ‘‘सदृश औषध् की एक मात्रा’’
वो चिकित्सक जो बुखार के कई दवाओं के मिश्रण, पेटेन्ट और वायो कम्बीनेशन देते है, या अतिसार के लिए एलो, पोडो, क्रोटोन टिग0 वो होमियोपैथिक सिद्धान्त या सिमिलिया, सीमिलिवस, क्यूरेन्टर के अनुसार चिकित्सा नहीं है
अब उन्हे एक सच्चा प्रयास के लिए अग्रसर होना चाहिए और होमियोपैथी के प्रति न्याय करना चाहिए ।
एक रोगी को 3 बजे सुबह जाड़ा लगकर 4 बजे बुखार हो गया, इसके साथ ही ठंडे पानी की प्यास भी जाड़ा लगने के साथ ही है,
जाड़ा बन्द हो गया, बुखार भी गायब हो गया, परन्तु भयंकर सिरदर्द शुरू हो गया,
रोगी सुस्त हो गया, एवं नींद खत्म हो गयी ।
पंखा चाहता है, परन्तु किसी हड्डी में दर्द नही और ना ही शरीर में कोई शिकायत भी नही करता ।
अब इस केस को ANALYSIS एवं REPERTORISE करते है ।
1. CHILL AT 3 AM : NIGHT MID NIGHT AFTER 3 HOURS ON WALKING - ONLY FERR.
2. CHILL, NIGHT, MID NIGHTAFTER: ARS,CALAD, HEP, OP, THUJA, COFF, DROS, MAG-S, MANG, MERC, MEZ, PETR, SIL, SUL.
3.CHILL [CHAPTER] - TIME 3 HOURS- ALOE, AM-M, CAUST, CEDRON, CINNI, CINA, EUP PERF, FERR, LYSS, N-MUR, RHUS TOX, SIL, YHIYA
4. SOME RUBRICS - 3AM : ARS [COMPLETE REP.] 3-5 AM - KALI CARB [COMPLETE -REP.]
5. FEVER[CHAPTER]: SUCCESSION OF STAGE CHILL FOLLOWED BY HEAT - 78 DRUGS
अब आप स्वंय देख रहें है,
इन रूबरिक देखकर ही मन भ्रमित हो जा रहा है,
अब आप अपने रोगी को कौन सी दवा देंगे और क्या ठीक करेंगे?
अन्य जो छोटे RUBRICS इसके साथ दिखेंगे वो है, पसीना के साथ , जाड़ा के पहले गर्मी लगना, पसीना के बाद प्यास, वगैरह-वगैरह,
ये तो हमें और CONFUSE कर दे रहें है ।
अलग-अलग रेपर्टरी के अलग VERSIONS में भिन्न-भिन्न दवाएँ नजर आती है ।
अब बेचारा होमियोपैथ क्या करे?
वो सबको छोड़कर 2, 4 या 6 दवाओं का समिश्रण तैयार करता है । जिन दवाओं में मुख्य रूप से ठण्ड, गर्मी, प्यास होती है इनको 2 - 2घंटे पर देने का आदेश देता है, पिर रोगो की तकलीफ 3-4 दिनों में कम जो जाती है और होमियोपैथ खुश हो जाता है कि उसकी दवा ने बुखार ठीक कर दिया और उसने रोगी को ऐलोपैथ के पास जाने से बचा लिया ।
यह होमियोपैथ जान ही नही पाता है कि मिश्रण ने VIRAL या BACTERIAL INFECTION को अन्दर ही दवा दिया है, जो कि अपने COURSE के अनुसार चल रहा है और कुछ समय बाद वह वापस आ जायेगा ।
जब मैने अपनी होमियोपैथिक कैरियर का शुरूआत किया था तो इन सभी का प्रयोग किया था, अपने आत्म विश्वास को वापस पाने के लिए सभी को आजमाया था, कई दवाएँ व कई-कई बार रिपीटिशन करता था जिसका परिणाम यह होता था कि केस ऐलोपैथों के पास चला जाता था, जो कि यह कहते हुए जाते थे कि सीरियस बीमारियों का ईलाज होमियोपैथी में है ही नहीं ।
हममें से सभी के साथ ऐसा ही हुआ है, लेकिन एक बात हम सभी मानते एवं जानते है कि किसी भी स्थिति और कैसी भी परिस्थिति हो, अगरRIGHT SIMILIMUM दवा मिल जाती तो एक केस भी हमारे पास से कहीं भी नही जाने वाला था।
अगर हमें रोगग्रस्त रोगी का ईलाज करते, ना कि रोगी में ग्रसित बीमारी का ।
सही मानिए,
अगर इस एक लाईन को सही तरह ‘‘इसके भाव के साथ’’ समझ गयें, तो कोई रोग हमसे बच नही सकता और ना हमें डरा सकता है, क्योकि अब हमें रोग नही रोगी दिखाई देने लगेगा ।
तब ही हम अपनी चिकित्सा में रोगी के साथ, होमियोपैथी के साथ और साथ ही अपने साथ भी न्याय कर सकेंगे । ये चीजें हमारी उत्साह और साहस बढ़ाने वाली है, आइये, हम बीमारी से लगें ।
हमें ध्यान रखना होगा,
आज की नई MODERN MEDICINE को देखिये, जिसमें ‘‘टीकाकरण’’ भी है, यह होमियोपैथिक सि(न्त की देनें है, इसमें जरा भी संदेह नही होना चाहिए।
अब करोड़ रूपये का सवाल यह है कि अगर ऐलोपैथ, होमियोपैथिक को अपना सकते है जैसे कि TUBERCULOSIS से रक्षा के लिए TUBERCULAR BACILLI को रोगी को देते है और TETANOUS TOXID को TETANOUS ठीक करने में उपयोग कर है, और वो भी बार-बार नही बल्कि 3-3 महीनों पर एक खुराक का डोज देते है और जिससे इन्सान स्वस्थ रहता है, तो क्यों नही हम होमियोपैथ अपने ‘‘सि(ान्तों’’ पर भरोसा करते है?
जब एक ऐलोपैथ, एकल औषध् सि(ान्त एवं एक डोज पर विश्वास करने लगे है
हम इन सबके बाद, किसी रोगी की रक्षा करने के लिए 1 या 2 दवाओं की एक साथ क्यों जरूरत पड़ती है?
जिनका की सि(ान्त ही है, एक दवा और एक खुराक ।
आईये, वापस अपने केस पर चलते है,
यहाँ इस केस में ठण्ड, ठण्ड का समय या ठण्ड का प्रकार, सिरदर्द पसीना का समय ये महत्वपूर्ण तो है पर ज्यादा नही ।
यह जाड़ा और कपकपी सिर्फ बीमारी का एक लक्षण है और एक साधरण प्रक्रिया है, गर्मी उत्पन्न होने के एहसास का ।
यह अपने आप ही पैदा होता है, जब कोई व्यक्ति रोग के गिरपफत में होता है ।
CHILL और SHIVERING का उत्पन्न होना को मान लें शरीर की एक ऐसी प्रक्रिया जिसके कारण गर्मी उत्पन्न होने की व्यवस्था शुरू हो रही है । ऐसा इसलिए होता है कि शरीर जड़त्व पैदा कर, गर्मी उत्पन्न करता है क्योंकि शरीर उस गर्मी से BACTERIA या VIRUS या PARACITE को खत्म करना चाहता है ।
यह शरीर की अपनी व्यवस्था है, अपने आप को बचाने के लिए।
इसमें कोई संदेह नही है कि अलग-अलग व्यक्ति में अलग तरह की सुरक्षा की व्यवस्था होती है, पर इस रोगी की रेपर्टरी से दवा SELECT करना सही नही हो सकता हे बल्कि CONFUSION बढ़ा रहा है ।
अगर इन सबको ध्यान में नही रखेंगे तो क्या दवा PRESCRIBE करेंगे ।
हम लोग रोगी व्यक्ति के ईलाज में ध्यान दें
व्यक्ति या उसके व्यक्तित्व में जो परिवत्र्तन आया है, उसे समझे तभी SIMILIMUM दें सकेंगे ।
NO DOUBT , प्रत्येक लक्षण, चाहे वो दर्द हो या जाड़ा या किसी तरह का बुखार, यह रोगी व्यक्ति का प्रतिनिध्त्वि करते है, लेकिन इसके कुछ और भी प्रतिनिध् , जो इसका प्रतिनिध्त्वि करते हैं और ये होते हैं, मुख्य प्रतिनिध् िजो VITAL FORCE के है । पर नयी बीमारी में जिसको की अन्य मुख्य लक्षणों के साथ जोड़कर SIMILIMUM तक पहुँचाते है ।
डा0 अशोक गुप्ता
क्लिनिक, गंज नं-2 इलमराम चैक, संयुक्त अस्पताल के सामने, बेतिया, प० चम्पारण
मो०: 9931093995

टी0वी0 एक खुराक में ठीक

टी0वी0 एक खुराक में ठीक
एक रोगी जिसे दिन के समय बुखार आता था और दिनों-दिन जिसका वजन गिर रहा था, एक मेरे पुराने रोगी का रिश्तेदार था, जिससे मिलने के बाद रोगी ने कहा कि देखिए ना, मुझे लगता है कि किसी ने मेरे पर जादू कर दिया है, एक दिन किसी ने मेरे घर में ताबीज पफेंक भी दिया और उसी दिन से मेरा शरीर गल रहा है ।
तब मेरे पुराने रोगी ने कहा कि आप मेरे साथ मेरे डाक्टर साहब के पास चलिए वो ठीक कर देंगे । उक्त वक्तव्य के साथ रोगी अपने रिश्तेदार के साथ क्लिनिक में आते ही बताये ।
मैंने रोगी को चेक किया एवं Anti-tubercular test लिख दिया और रोगी को Stramonium-30/1 एक खुराक खिला दिया ।
अगली बार रोगी Test Report लेकर आया, जिसको देखने के बाद पता चला किReport-Positive था यानि रोगी को Tubercularsis हो चूँका था ।
मैंने रोगी से पूछा-क्या हाल है?
रोगी ने कहा-डाoसाहब, आपकी एक खुराक दवा ने कमाल कर दिया है, अब मैं अच्छा महसूस कर रहा हूँ और डाक्टर साहब मैंने अपना वजन भी चेक किया हूँ-1kg किलो वजन भी बढ़ गया है ।
मैंने रोगी से कहा-बहुत अच्छा है, पहले वाली दवा लगातार समय से खाते रहिए ।
रोगी बीच-बीच में 3-4 बार आकर ठीक होने की रिपोर्ट देता है और SL के साथ Continue करते रहा ।
एक महीने के बाद पिफर Anti-Tubercular test कराने को बोला,
रोगी जब रिपोर्ट लेकर आया तो रिपोर्ट देखकर मैं दंग रह गया क्योंकि रिपोर्ट Nigative था ।
Tuberculosis जैसे रोग में इतनी जल्दी रोग मुक्त होना, इसे होमियोपैथी की अद्भूत उपलब्ध् नहीं तो और क्या कहेंगे ?
इस केस में निम्न रूबरिक लिये गये थे ।
1. Delusion-injured, about to recieve is
2. Fear, injured of being
3. Superstitious
4. Delusion, House, surrounded, house is.

Sunday, January 3, 2010

ग्रेट दिस्कोवेरी-होमोपथी

इस सदी का महानतम अविष्कार जिसे इन्सान ने किया- उसे ‘‘इलेक्ट्रीसिटी’’ कहते है, कुछ लोग इस आपति उठाते है और तर्क देते हैं कि यह दुनिया चलती रहती है और आवश्यकता अनुसार अविष्कार किये जाते रहे है क्योंकि ‘‘चक्के’’ के अविष्कार के बाद ‘‘हवाई जहाज’’ एवं ‘‘राॅकेट’’ का भी अविष्कार हुआ जो कि अन्य महानतम अविष्कारों के श्रेणी मे उग्रणीय है । मगर कुछ लोग ऐसे भी है, जो यह कहते हे कि ‘‘न्यूक्लियर एनर्जी का उत्पादन एवं इसका प्रयोग’’ महान अविष्कार है । अब इसका निर्णय कैसे होगा कि कौन सबसे महान अविष्कार है? आईये, इसको ‘‘मियाज्म’’ के हिसाब से देखते है- ज्यादातर अविष्कार मनुष्य के जीवन को आराम, आरामदेय और सुख-सुविधाओं के मददेनजर किये गये है, ये ैलबवेमे की उत्पति के कारण हुए है । कुछ ऐसे अविष्कार जो प्रकृति के खिलाफ काम करते है और ‘‘मनुष्य जीवन को नाश’’ करने वाले है, चाहे वह स्वयं का हो या दुसरो का, यही नही कोई ऐसा काम, जो किसी भी जीवन के लिए, जो कि पृथ्वी पर है, उसका ‘अनिष्ट’ करने वाला हो या अनिष्ट में सहयोग पहुँचाता है। ये ैलचीपसपे के उत्पति के कारण होता है और खास तौर से ैलचीपसपे व्यक्तियों द्वारा ही अविष्कारित होते हैं, अगर इन व्यक्तियों में ैलचीपसपे ज्तंपा मौजूद ना होता तो उनके द्वारा अविष्कार ही नही हो सकता था। और ऐसे अविष्कार जो मनुष्य के ‘‘स्वास्थ्य’’ मंे सुधार करते हो, या सुधार करने में सहायक हो ष्च्ैव्त्।ष् की उत्पति के सूचक है और सही मायने में, यही अविष्कार, ‘‘महान अविष्कार’’ कहलाये जाने चाहिए । हमें तो ईश्वरीय स्वरूप में भी ‘‘मियाज्म’’ दिखता है । हिन्दू ‘‘धर्मग्रन्थों’’ में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वर्णन मिलता है । आये दिन, इन देवी देवताओं के पूजन समारोह हुआ करता है । हिन्दू धर्म ग्रन्थ के अनुसार श्री ब्रह्मा ‘‘पैदा करने वाले’’ है, श्री विष्णु, ‘‘पालन’’ करने वाले है और महेश यानि कि ‘‘शंकर भगवान’’ संहार करने वाले है । ‘मियाज्मी तौर पर ब्रह्मा ‘जनक’’ यानि कि सोरा, विष्णु ‘‘पालक’’ यानि की साइकोसिस और महेश ‘संहारक’’’ यानि कि सिफलिस । ठीक इसी तरह जब हम गहराई से समझते है तो पता चलता है, ‘‘मियाज्म’’ हमारे जीवन के साथ चलते रहता है । ‘‘श्री वैष्णों देवी का भव्य, मंदिर जम्मू काश्मीर स्टेंट में है, जहाँ हर साल लाखों भक्त जाते है। जहाँ माता वैष्णो, तीन पिड़ियों के स्वरूप में विराजमान है । इन तीनों पिड़ियों में एक माँ सरस्वती, दुसरी माँ लक्ष्मी एवं तीसरी माँ काली की है और इन तीनों शक्तियों के मिले-जुले स्वरूप को माता वैष्णों के रूप में जानी जाती है, मगर इन्हें भी ‘‘मियाज्म’’ के अनुसार देखते है, तो माँ सरस्वती ‘‘सोरा’’ है माँ लक्ष्मी-सायकोसिस और माँ काली- सिफिलिसि थोड़ा और आसान शब्दों में कहे तो माँ सरस्वती यानि की ‘‘विद्या’’ यानि की आवश्यकता ये ‘‘सोरा’’ है । माँ लक्ष्मी यानि कि ‘वैभव’ यानि कि ‘विश्वास’’ यानि कि सुख समृद्धि ये साइकोसिस के सूचक है और माँ काली यानि कि ‘संहारक’ यानि कि ‘नाशकर्ता’ सिफिलिस की सूचक है । आपको ये सभी बातें एक ष्ठवउइष् की तरह लग रही होगी, जो कि आपके दिमाग में फूट रही होगी । जी, हाँ यह सभी ज्ञान-एक वम्ब की तरह ही है अगर आप इसको अच्छी तरह समझ लें तो यह निश्चित है कि अगर ये समझ मे आ गया तो दुनिया छोटी दिखने लगेगी एवं चिकित्सा के क्षेत्र में जितने अविष्कार अब तक हुए, उन सबसे यह महान ‘अविष्कार’ होगी, आपके लिए । यह डा0 हैनिमैन का ही ‘‘सोच’’ था, एक आईडिया था, जिसने होमियोपैथी को इतनी उँचाई पर ले गया और इनके द्वारा ही डा0 बोनिनघसन, डा0 हेंरिंग, डा0 ऐलन, डा0 केन्ट और डा0 वोगर के पास गया । मैं निसंकोच कह सकता हूँ कि पुरी दुनिया में लाखो-करोड़ों होमियोपैथिक टीचर होगें, लेकिन बहुत कम ही होंगे, जिन्होंने उस तरह होमियोपैथी को समझा होगा जिस तरह डा0 हैनिमैन चाहते थे कि समझा जाये । यहाँ पर बहुत महान होमियो चिकित्सक है और कुछ तो बहुत अच्छे भेटेरिया मेडिका के शिक्षक भी है, यहाँ तक की होमियोपैथिक फिलास्फी एवं रेपर्टरी, उन्हें ‘‘जुबानी’’ तक याद है मगर डा0 हैनिमैन की सोच तक नही पहुँच पा रहे हैं क्योंकि ऐसी सोच ‘‘आम आदमी’’ के बस का ही नही है, इसके लिए हमें असाधारण परिश्रम करना ही पड़ेगा । इसके लिए हमें अपनी असफताओं से ‘सीखना’ चाहिए कि हम अपने केस में अगर फेल हुए तो क्यों हुए? हमारी दवा चुनने में कहाँ कमी रह गयी? ‘‘अनुभव’’ द्वारा ही हम इसे जान पाते हैं क्योंकि ‘अनुभव’ ही हमारा सच्चा शिक्षक है जो कि कभी भी ‘गुमराह’ नही होने देता है और मनन करने पर बता देता है कि आप यहाँ पर गलत थे । चाहे हम किसी ‘‘मेथड’ द्वारा रोगियों के लिए दवा का चुनाव करें । परन्तु चाहिए सिर्फ ‘‘एक सिमिलियम रिमेडी’’ ही । पिछले दिनों ‘‘माइंड टेक ऐसोसियसन’ के क्लास में कुछ इसी तरह के अनुतरित प्रश्न डाक्टरों द्वारा पुछे गये थे । कलकता से आये, डा0 बी0 एन0 चक्रवर्ती ने बताया कि ‘होमियोपैथिक माइंड’ पढ़ कर, इनमें कई तरह के असाध्य रोगों में चिकित्सा करने का साहस पैदा हुआ, परन्तु जल्द ही वह ‘‘साहस’’ निराशा में बदल गया और उन्हें आज तक समझ नही आया कि ऐसा कैसे हों गया। उन्होंने बताया कि एक ।बनजम त्मदंस थ्ंपसनतम का केस था, जिसमें उन्होंने अच्छी ॅमसस ेपउपसपउनउ का चुनाव किया एवं स्लबव का इस्तेमाल रोगी पर किया । अगले सप्ताह रोगी ने रिपोर्ट किया कि बहुत अच्छा है, सभी तकलीफों में ‘आराम’ है और मुझे होमियोपैथी एवं आप पर भरोसा हो गया है, कि अब मैं बच जाउँगा क्योंकि मेरा ैमतपनउ. ब्तमंजपददम - ठसववक न्तमं घट रहा है। नींद भी अच्छी आ रही है भुख लग रही है और मेरे खाने का रूचि बढ़ गयी है और कल से मैं अपने काम पर भी जा रहा हूँ। मगर रोगी की यह खुशी ज्यादा दिन तक नहीं रह सकी क्योंकि फिर अचानक धीरे-धीरे रोगी का हालत में गिरावट शुरू हो गयी, जो वजन ‘दवा’ देने के बाद बढ़ रहा था वो घटने लगा, ब्लड प्रेसर भी हाई होने लग गया, कुछ-कुछ सूजन भी बढ़ने लगा। पहले जो ैमतपनउ ब्तमंज घट गया था वो बढ़ने लगा ठसववक न्तमं का लेवल भी बढ़ गया तथा साँस लेने में कठिनाई होने लगा । बार-बार स्लबवचवकपनउ देने के बाद भी सुधार नही हुआ । पोटेन्सी बदल-बदल कर दिया गया मगर जो फायदा पहली खुराक से हुआ था, वो फिर नहीं दिखाई पड़ा । दवा बदल कर भी देखा, मगर कोई फायदा नजर नहीं आया, लाख कोशिश के बाद भी, अन्ततः रोगी मर गया । ऐसा क्यों हुआ? लखनउ से आये, डा0 समीर ने भी इसी तरह के एक रोगी के बारे में बताया कि यह रोगी प्ण्भ्ण्क्ण् (इसिच्मीक हार्ट डीसिस) का था और काफी चिकित्सा के बाद भी इसे असाध्य मान कर ऐलोपैथो द्वारा मरने के लिए छोड़ दिया गया था, मेरे पास पहुँचा । मैंने काफी मेहनत करके उसके लिए ।त्ै का चुनाव किया एवं दवा दिया, अगले दिन ही सूचना मिली, काफी सुधार है । पाँच महिने तक उतरोतर सुधार होता रहा । रोगिणी जब भी दवा लेने आती थी तो कहती थी, डा0 साहब जब से आपके ईलाज में हूँ बहुत अच्छा महसूस कर रही हूँ। मगर अचानक एक दिन फोन आया कि डा0 साहब जल्दी आईये, रोगिणी की हालत बहुत खराब है । घर जा कर देखा, तो रोगिणी काफी सीरियस नजर आयी, बेहोशी के साथ सांस काफी दिक्कत से ले पा रही थी । आक्सीजन लगाया गया तथा फिर से ।त्ै का प्रयोग किया एवं शाम को खबर तो आयी, मगर पहले के खबर से अलग थी कि रोगिणी को अब किसी दवा की जरूरत ही नही है। शाम होने के पहले ही उसका इन्तकाल हो गया । ऐसा क्यों हुआ? क्या होमियो चिकित्सा, टोना-टोटका की तरह है? या ैपउपसपं ैपउपसपइने का सूत्र एक ‘मजाक’ है? इसी तरह के प्रश्न उठते रहे। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या होमियोपेथिक दवाओं की भी कोई ‘सीमा’ है, जहाँ से आगे जा कर यह काम नही करता है? क्या यह सिर्फ नयी बीमारियों में ही फायदेमंद है? क्या यह गम्भीर रोगों में क्षणिक फायदा ही पहँचा सकता है? अगर इन सारे प्रश्नों के जवाब हाँ है तो फिर डा0 हैनिमैन को होमियोपैथी के अविष्कार की जरूरत क्या थी? क्यों आर्गेमन में पुरानी बीमारियों के चिकित्सा के ही विषय में लिखा गया है? क्यों हम लोग अक्सर सुनते है कि ‘कैन्सर’ का रोगी होमियो ईलाज से ठीक हो गया । क्यों होमियोपैथी द्वारा चमत्कार होते है? क्यों, ये चमत्कार कुछ रोगों में हो जाते है, सभी में नहीं? क्या, ये चमत्कार गलती से हो जाते है? सारे प्रश्नों का ‘‘सार तत्व’’ यह है कि क्यों ‘‘होमियोपैथ्स’’ फेल करते है? वो कौन से कारण है, जिनके कारण ‘‘होमियोपैथ्स’’ फेल हो जाते है, हम नित नई-नई दवाआंे के खोज में लगे है, मगर यह नही समझते है कि ‘सल्फर’ जैसी प्योर सोरिक रिमेडी से कैन्सर जैसी सिफिलिटिक रोग कैसे ठीक किया जाता है? कलकता के डा0 बी0 एन0 चक्रवर्ती जी के किडनी केस में क्या हुआ । आइये विवेचना करे- बीमारी की उत्पति के दौरान प्राथमिक लक्षण उत्पन्न होते है, जिन्हें ऐलोपैथिक दवाओं द्वारा खत्म कर दिया जाता है । ब्लड-प्रेशर एक बड़ा करण हो जाता है, ‘‘किडनी को फेल’’ करने का। अगर ब्लड - प्रेशर हो गया है, तो उसकी ‘‘कारण-चिकित्सा’’ होनी चाहिए, ना कि रूटिन तौर एक दवा, चाहे वो ऐलोपैथिक हो या होमियोपैथिक लगातार खाने रहने पर ‘‘किडनी फेल’ हो जायेगा, इसमें संदेश नही है । इस प्रक्रिया को शरीर क्रिया विज्ञान के आलोक में समझते है- जब ‘‘रेनल अर्टरी’ में छंततवू वाली स्थिति बन जाती है तब खून की सप्लाई किडनी में कम होने लगती है । जब कि किडनी को प्रयाप्त आपूर्ति चाहिए, पर उपरोक्त कारण के वजह से यह सम्भव नही हो पाता है, जिसके कारण शरीर दुसरी तरफ इसकी आपूर्ति की व्यवस्था में लग जाता है और हार्ट पर प्र्रेसर बनाने लगता है कि तुम, अत्याधिक दबाव के साथ खून का संचालन करो ताकि अधिक जोर से खून, झटका देते हुए बढ़े एवं अर्टरी में जो छंततवूमक स्थिति सुधर जाये और किडनी को प्रयाप्त खून मिलने लगे ताकि शरीर पूर्ण रूप से अपना काम करें । मगर यहाँ पर कारण चिकित्सा ना करके ब्लड प्रेसर कम करने की दवा चलानी शुरू हो गयी । एण्टी हाइपरटेन्सिव ड्रग ने, चाहे वो होमियोपैथिक हो या ऐलोपैथिक ब्लड प्रेसर को तो कम किया, जिसे आम भाषा में कहा जाता है कि इस दवा से मेरा ब्लड प्रसर कन्ट्रोल हो गया पर किडनी को तो ब्लड की आपूर्ति पुरी मात्रा में तो नही हो रही और धीरे-धीरे और कम सप्लाई होती जायेगी, जिसके कारण किडनी का बचना तो असम्भव ही है यानि कि किडनी फेल हो गयी । क्योंकि किडनी के परेन्चाईमा धीरे-धीरे नष्ट हो रही थी, और यह ब्लड-पे्रसर के कारण नही हुआ बल्कि किडनी में खून की आपूर्ति कम मात्रा में होने के कारण हुआ और यहाँ पर ऐलोपैथिक डाक्टर एक ही सलाह देते है कि अब बिना ‘‘डायलिसिस’’ किये कोई उपाय नही है । डा0 बी0 एन चक्रवर्ती की स्लबवचवकपनउ ने भी ‘‘डायलिसिस’’ का ही काम किया, जिसके कारण रोगी में उतरोतर सुधार होता गया, स्थिति रोज-व-रोज अच्छी दिखाई पड़ने लगी, मगर ‘‘रोग की कारण-चिकित्सा’’ यहाँ भी ना की गयी और रोग धीरे-धीरे ैलबवजपब से प्रोग्रेस कर ैलचीपसपजपब में चला गया तब रोगी की हालत खराब होने लगी, अगर इस समय भी रोगी की ‘‘कारण सहित सम्पूर्ण चिकित्सा’’ की जाती तो शायद रोगी आज जीवित होता परन्तु ष्चमतमिबज ेपउपसपउनउश् रिमेडी तक नही पहुँच पाने के कारण, रोगी मर गया । डा0 हैनिमैन ने अपनी पुस्तक श्ब्ीतवदपब क्पेमंेमेश् और आर्गेनन के सूत्र नं0- 205 में लिखा है कि अगर होमियोपैथिक चिकित्सक किसी रोगी में प्राईमरी लक्षणों को नही पाता है, यदि पहले से ही नष्ट हो गये हो तो उसको अब श्कमंस ूपजी ेमबवदकतल वदमेश् की तरह सोचना चाहिए और पता लगाना चाहिए कि इन लक्षणों के पहले कौन से लक्षण उत्पन्न हुए थे यानि कि अगर यह रोगी ैलबवजपब ैजंजम में आया है, तो च्ेवतं क्या था ? इसका साफ-साफ मतलब है कि ब्ीतवदपब कपेमंेमे वत ज्मतउपदंस ब्ंेमे वत ळतंअम च्ंजीवसवहपबंस क्पेमेमे की चिकित्सा करने के पहले आपको सम्पूर्ण रोगी इतिहास को इस्तेमाल करना पड़ेगा। शायद इसी लिए डा0 हैनिमैन ने लिखा है कि ष्ब्ंददवज इम जतमंजमक ूपजी वनज जीम न्दकमतसलपदहष् ष्डपंेउष् इमपदह जंामद पद जव बवदेपकमतंजपवदण्ष् जब भी हमलोग होमियोपैथिक दवा का चुनाव करते है, सिर्फ यह नही सोचना है कि लक्षणों से सादृश्य दवा लेना है या क्पेमंेम से सादृश्य दवा चुनना है बल्कि रोगी के इतिहास से भी सादृश्य दवा चुनना है ।